संयुक्त राष्ट्र ने राजस्थान के आदिवासी समुदायों की भूमिका पर प्रकाश डाला
- वैश्विक चुनौतियों के लिए राजस्थान के मूल आदिवासी समुदायों द्वारा प्रस्तुत समाधान तथा नीतियों के क्रियान्वयन में उनकी भूमिका पर सप्ताहांत में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सतत विकास पर आयोजित उच्च स्तरीय राजनीतिक फोरम (HLPF) में प्रकाश डाला गया।
मुख्य बिंदु :
- राज्य के एक प्रतिनिधि ने आदिवासियों की पारंपरिक गतिविधियों के बारे में बताया, जिससे उनकी समृद्ध प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद मिली है।
- यह फोरम संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) के तत्वावधान में आयोजित किया गया था, जिसका विषय था, ‘वर्ष 2030 के एजेंडे को सुदृढ़ बनाना और कई संकटों के समय में गरीबी को मिटाना: सतत, लचीले और अभिनव समाधानों का प्रभावी वितरण।’ फोरम में अपनाए गए मंत्रिस्तरीय घोषणापत्र में सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिए नए सिरे से प्रोत्साहन देने का आह्वान किया गया।
- फोरम को संबोधित करते हुए विशेषज्ञों ने जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में स्वदेशी समुदायों को उनके समाधानों के लिए मान्यता देने के महत्व को रेखांकित किया। विशेषज्ञों ने कहा कि स्वदेशी समुदायों को वैश्विक स्तर पर रणनीतियों के निर्माण में शामिल किया जाना चाहिए, जो पारंपरिक गतिविधियों के माध्यम से सतत विकास में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।
- बांसवाड़ा स्थित स्वैच्छिक समूह वाग्धारा के सचिव जयेश जोशी ने कहा कि प्राकृतिक और समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोणों के प्रति श्रद्धा में निहित स्वदेशी प्रथाएँ स्थिरता और रेसिलिएंस को बढ़ावा दे सकती हैं, जो संकटों के बीच वर्ष 2030 के एजेंडे को मजबूत करने के लिए आवश्यक हैं। श्री जोशी ने कहा, "स्वदेशी समाधान न केवल अपनी ज़रूरतों को पूरा करते हैं बल्कि व्यापक स्थिरता लक्ष्यों में भी योगदान देते हैं।"
- दक्षिणी राजस्थान में आदिवासी आजीविका के मुद्दों पर काम कर रही संस्था वाग्धारा ने हाल ही में फसल विविधता और जलवायु रेसिलिएंस के बीच संबंधों को बहाल करने के लिए देशी बीज किस्मों के संरक्षण के अपने आंदोलन के हिस्से के रूप में इस क्षेत्र में 90 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए। श्री जोशी ने कहा कि आदिवासी किसानों ने इन कार्यक्रमों में देशी बीजों को बचाने और उन्हें अपनी नियमित कृषि पद्धति में इस्तेमाल करने की शपथ ली थी।
- श्री जोशी ने कहा कि चूंकि वैश्विक समुदाय जलवायु परिवर्तन और उसके सामाजिक-आर्थिक परिणामों सहित अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है, इसलिए आर्थिक असमानता और पर्यावरण क्षरण की अन्य चुनौतियाँ निकट भविष्य में और भी गंभीर हो जाएँगी। उन्होंने कहा कि राजस्थान के आदिवासियों ने पर्यावरण, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रणालियों में सतत और लचीले समाधानों द्वारा निर्देशित एक अभिनव दृष्टिकोण अपनाया है।
- श्री जोशी ने कहा, "स्वराज (संप्रभुता) के सिद्धांतों से प्रेरित होकर, आदिवासियों की जीवनशैली और सांस्कृतिक मूल्यों ने आत्मनिर्भरता, बाहरी स्रोतों पर कम निर्भरता और उन्नत कृषि पद्धतियों को जन्म दिया है, जिससे उनके परिवारों के लिए भोजन, पोषण और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित होती है।" उन्होंने कहा कि विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी में बाधा डालने वाली चुनौतियों को पहचानने और उनसे निपटने के लिए सभी कार्य योजनाओं में मूल निवासियों को शामिल किया जाना चाहिए।
- वाग्धारा सचिव ने बताया कि बीज संप्रभुता, मृदा संप्रभुता, खाद्य एवं पोषण संप्रभुता, जल संप्रभुता और सांस्कृतिक संप्रभुता पर आधारित पहलों ने राज्य में जनजातीय समुदायों को सामूहिक रूप से महत्वपूर्ण चुनौतियों पर काबू पाने के लिए सशक्त बनाया है।
- श्री जोशी और अन्य प्रतिभागियों ने स्वदेशी और कमजोर समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनकी कृषि प्रणालियों, आजीविका और आवासों की रक्षा के लिए वैश्विक प्रयासों पर प्रकाश डाला। राजस्थान में बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और उदयपुर जिलों के आदिवासियों ने जल, जंगल, जमीन और बीज जैसे महत्वपूर्ण तत्वों को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास किए हैं, जो उनके अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- फोरम में जिन आदिवासियों की सर्वोत्तम गतिविधियों पर प्रकाश डाला गया, उनमें स्थानीय बीजों का उत्पादन, स्रोत पर जल संरक्षण, कृषि में पशुओं का उपयोग, मिश्रित फसल के माध्यम से मिट्टी के कटाव को रोकना और पोषण सुरक्षा के लिए बिना खेती वाले खाद्य पदार्थों का उपयोग शामिल है। इन गतिविधियों ने आदिवासी समुदायों को बाजार पर अपनी निर्भरता कम करने और वर्ष 2020-21 में कोविड-19 महामारी सहित कठिन दौर में जीवित रहने में मदद की है।
- श्री जोशी ने कहा कि जनजातीय समुदायों की पारंपरिक प्रथाएं न केवल उनकी आकांक्षाओं को पूरा करेंगी, बल्कि उन्हें सतत और रेसिलिएंस समाधान प्रदान करेंगी, बल्कि गरीबी, असमानता और भेद्यता के मुद्दों को हल करने में भी मदद करेंगी, ताकि सतत विकास लक्ष्य (SDG) के लिए 2030 के एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके।
प्रीलिम्स टेकअवे
- SDG
- राजस्थान की जनजातियाँ

